रचना चोरों की शामत

Wednesday, 19 October 2016

आशाओं के दीप

 दीपावली के लिए चित्र परिणाम
आँगन-आँगन आशाओं के दीप जलाती
मन रोशन हो जाते, जब दीवाली आती

छोड़ रंज-गम हो जाता ब्रह्मांड राममय
दिशा-दिशा दुनिया की, मंगल-गान सुनाती

सपनों का नव-सूर्य, उदित होता अंबर में
और बाँचती प्रात नवल, अपनों की पाती

देख-देख कर दिव्य-ज्योत्सना, फैली जग में
प्राण-प्राण के नेह-दियों की, लौ बढ़ जाती  

तोरण सजते द्वार, अल्पना देहरी-देहरी
घर-घर को हर घरणी पावन-धाम बनाती

जब करता आह्वान जगत तब स्वर्ग-लोक से
सुख-समृद्धि के ले चिराग, लक्ष्मी उतर आती

पर्वों के अमृत से बनता जीवन उत्सव
दिल मिलते इस तरह कि जैसे दीपक-बाती  

मावस को दे मात, कालिमा काट, ‘कल्पना
दीपमालिका तीन लोक तक रजत बिछाती
   
- कल्पना रामानी

Friday, 7 October 2016

मातृ-शक्ति की छाँव

 माँ दुर्गा के लिए चित्र परिणाम
सकल विश्व में फैली चारों ओर जीव हित।
मंगलकारी मातृ-शक्ति की छाँव अपरिमित।

जब-जब आती पाप-लोभ की बाढ़ जगत में
नव-दुर्गा तब प्राण हमारे करती रक्षित।  

मनता जब नवरात्रि-पर्व हर साल देश में
दिव्य प्रभा से मिट जाता सारा तम दूषित।

घटस्थापना, जगराते, माहौल बनाते
जिसमें होते सकल दुष्टतम भाव विसर्जित।

चलता दौर उपवास भजन का जब तक घर-घर
माँ देवी से माँगे जाते, वर मनवांछित।
    
देशबंधुओं, नाम देश का पर्वों से ही    
विश्व-फ़लक पर स्वर्ण अक्षरों में है अंकित।

अमर रहें ये परम्पराएँ, युगों कल्पना” 
अजर रहे यह संस्कारों की ज्योत-अखंडित। 

-कल्पना रामानी

Sunday, 11 September 2016

जब से कर ने गही लेखनी

जब से कर ने गही लेखनी
शीश तान चल पड़ी लेखनी

बिन लाँघे देहरी-दीवारें
दुनिया भर से मिली लेखनी

खूब शिकंजा कसा झूठ ने  
मगर न झूठी बनी लेखनी 

हारे छल-बल, रगड़ एड़ियाँ  
कभी न लेकिन झुकी लेखनी

कभी नहीं सम्मान खरीदे
मान बचाती रही लेखनी 

हर मौसम के रंगों में रँग
रही बाँटती खुशी लेखनी

परिचित मुझसे हुआ तभी जग
जब परिचय से जुड़ी लेखनी

जीवन भर अब साथ कल्पना
चिरजीवी चिरजयी लेखनी 

-कल्पना रामानी

Saturday, 3 September 2016

अच्छा लगता है

नित्य नवेली भोर, टहलना अच्छा लगता है
चिड़ियों सँग, चहुँ ओर, चहकना अच्छा लगता है

जब बहार हो, रस फुहार हो, वन-बागों के बीच
मुस्काती कलियों से मिलना, अच्छा लगता है

गोद प्रकृति की, हरी वादियाँ, जहाँ दिखाई दें  
बैठ पुरानी यादें बुनना, अच्छा लगता है

झील किनारे, बरखा-बूँदों में सखियों के साथ
इसकी उसकी, चुगली करना, अच्छा लगता है

सूर्योदय, सूर्यास्त काल में, सागर सीने पर
आवारा नौका सम बहना, अच्छा लगता है

चाह, भरी महफिल में कोई मुझको भी गाए
गीत-गज़ल का हिस्सा बनना, अच्छा लगता है

दिया कल्पना तूने जो भी, हर ऋतु में उपहार 
कुदरत तेरा वो हर गहना, अच्छा लगता है। 

-कल्पना रामानी 

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