रचना चोरों की शामत

Sunday, 11 September 2016

जब से कर ने गही लेखनी

जब से कर ने गही लेखनी
शीश तान चल पड़ी लेखनी

बिन लाँघे देहरी-दीवारें
दुनिया भर से मिली लेखनी

खूब शिकंजा कसा झूठ ने  
मगर न झूठी बनी लेखनी 

हारे छल-बल, रगड़ एड़ियाँ  
कभी न लेकिन झुकी लेखनी

कभी नहीं सम्मान खरीदे
मान बचाती रही लेखनी 

हर मौसम के रंगों में रँग
रही बाँटती खुशी लेखनी

परिचित मुझसे हुआ तभी जग
जब परिचय से जुड़ी लेखनी

जीवन भर अब साथ कल्पना
चिरजीवी चिरजयी लेखनी 

-कल्पना रामानी

Saturday, 3 September 2016

अच्छा लगता है

नित्य नवेली भोर, टहलना अच्छा लगता है
चिड़ियों सँग, चहुँ ओर, चहकना अच्छा लगता है

जब बहार हो, रस फुहार हो, वन-बागों के बीच
मुस्काती कलियों से मिलना, अच्छा लगता है

गोद प्रकृति की, हरी वादियाँ, जहाँ दिखाई दें  
बैठ पुरानी यादें बुनना, अच्छा लगता है

झील किनारे, बरखा-बूँदों में सखियों के साथ
इसकी उसकी, चुगली करना, अच्छा लगता है

सूर्योदय, सूर्यास्त काल में, सागर सीने पर
आवारा नौका सम बहना, अच्छा लगता है

चाह, भरी महफिल में कोई मुझको भी गाए
गीत-गज़ल का हिस्सा बनना, अच्छा लगता है

दिया कल्पना तूने जो भी, हर ऋतु में उपहार 
कुदरत तेरा वो हर गहना, अच्छा लगता है। 

-कल्पना रामानी 

Thursday, 25 August 2016

नाम कृष्ण का

श्री कृष्ण जन्माष्टमी के लिए चित्र परिणाम
अंतर्घट की प्यास बुझाता, नाम कृष्ण का।
सदा मोक्ष का द्वार दिखाता, नाम कृष्ण का।

मानव-मन पर असुर दैत्य जब हावी होते
मलिन हृदय निर्मल कर जाता, नाम कृष्ण का।

भवसागर में जब नैया, हिचकोले खाती
बन पतवार, किनारे लाता, नाम कृष्ण का।

राह भटकता अन्तर्मन, आलोकित करके
गीता के संदेश सुनाता, नाम कृष्ण का।

निराकार है, पर देखें यदि, ध्यान लगाकर
सगुण ब्रह्म का बोध कराता, नाम कृष्ण का।

लाख बलाएँ, रोग, दोष, हों भू पर काबिज
हर बाधा को हर ले जाता, नाम कृष्ण का।

गोकुल-मथुरा मध्य उफनती, यमुना का जल
पुरा काल से याद दिलाता, नाम कृष्ण का।  

भादों में जब कृष्ण जन्म का, पर्व मनाते
भारत-भू पावन कर जाता, नाम कृष्ण का।

यूँ तो हैं भगवान कल्पनासभी बराबर
पर खुद से पहचान कराता, नाम कृष्ण का।   

-कल्पना रामानी

Friday, 19 August 2016

रक्षा-बंधन पर्व मनाने सावन आया


रसमय स्नेह-सुधा बरसाने, सावन आया 
रक्षाबंधन पर्व मनाने, सावन आया 

पीहर से पिय घर तक स्नेहिल-सेतु बनाकर 
बहनों का सम्मान बढ़ाने, सावन आया 

बोल रही रस घोल कान में, हवा बहन के
चलो मायके रंग जमाने, सावन आया 

अहं-तिमिर से आब खो चुके बुझे दिलों में 
पावनता की ज्योत जगाने, सावन आया 

झूम रहा हर पेड़, देख पाँतें झूलों की 
डाल-डाल पर पींग बढ़ाने, सावन आया 

मचल रही पग-हाथ रचाने, हिना, बहन के 
पायल-धुन पर गीत सुनाने, सावन आया 

राखी बँधी कलाई-कर से हम बहनों को 
नेह-नेग अधिकार दिलाने, सावन आया 

टूट रहे जो आज ‘कल्पना’ पावन रिश्ते 

उनमें फिर से गाँठ लगाने, सावन आया 


-कल्पना रामानी

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